1. परिचय
कुम्हार समाज को प्रजापति समाज भी कहा जाता है।
"कुम्हार" शब्द "कुंभ" (घड़ा) से बना है, यानी कुंभ बनाने वाला।
प्रजापति समाज का कार्य प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और शिल्पकला से जुड़ा रहा है।
इन्हें धरती माता के पुत्र माना जाता है क्योंकि ये मिट्टी से जीवंत कला रचते हैं।
2. उत्पत्ति
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और वही प्रजापति समाज के आदि पूर्वज माने जाते हैं।
कुम्हार समाज की कुलदेवी श्रीयादे माता मानी जाती हैं।
इस समाज का उल्लेख वेदों, पुराणों और रामायण-महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है।
3. धार्मिक महत्व
प्रजापति समाज को सृष्टि रचने वाले समाज के रूप में जाना जाता है।
मूर्ति-निर्माण, घड़े, दीपक, कलश और यज्ञोपयोगी वस्तुएँ प्राचीन काल से कुम्हार ही बनाते थे।
किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में कुम्हार समाज का योगदान अनिवार्य रहा है, जैसे:
- कलश स्थापना
- दीपदान
- मातृभूमि से जुड़े यज्ञ पात्र
4. इतिहास में योगदान
सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) में मिले बर्तन, खिलौने और मिट्टी की मूर्तियाँ कुम्हार समाज की कला का प्रमाण हैं (लगभग 5000 वर्ष पुराना इतिहास)।
महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के समय बर्तनों का उल्लेख मिलता है।
रामायण काल में भी यज्ञों में मिट्टी के पात्रों का उपयोग किया गया।
प्रजापति समाज ने हमेशा समाज को उपयोगी वस्तुएँ उपलब्ध कराई हैं।
5. सामाजिक पहचान
कुम्हार समाज को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
- प्रजापति (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश)
- कुंभकार (महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश)
- पाल/पांडे (कुछ राज्यों में)
भारत ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी कुम्हार समाज पाया जाता है।
6. कुलदेवी और आस्था
प्रजापति समाज की कुलदेवी: श्रीयादे माता
कई क्षेत्रों में शीतला माता की भी विशेष पूजा होती है।
7. वर्तमान स्थिति
पहले कुम्हार समाज की पहचान सिर्फ बर्तन बनाने से होती थी।
अब समाज शिक्षा, व्यवसाय, उद्योग, राजनीति और आईटी क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है।
फिर भी, पारंपरिक कला जैसे मिट्टी के बर्तन, दीपावली के दीये, मूर्तियाँ और हस्तशिल्प आज भी समाज की पहचान बने हुए हैं।
8. प्रजापति समाज की उत्पत्ति
पुराणों के अनुसार, दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और प्रजापतियों में प्रमुख माने जाते हैं।
इन्हीं दक्ष प्रजापति से प्रजापति (कुम्हार) समाज की उत्पत्ति मानी जाती है।
दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ, जिससे यह समाज शिव-शक्ति परंपरा से भी जुड़ता है।
9. निष्कर्ष
कुम्हार (प्रजापति) समाज का इतिहास हजारों वर्षों पुराना और गौरवशाली है।
उत्पत्ति दक्ष प्रजापति से मानी जाती है। कुलदेवी श्रीयादे माता हैं।
सिंधु घाटी से लेकर आज तक समाज ने भारतीय संस्कृति, धर्म और कला में अमूल्य योगदान दिया है।
प्रजापति (कुम्हार) समाज का इतिहास
प्रजापति समाज की उत्पत्ति
पुराणों के अनुसार, दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और प्रजापतियों में प्रमुख माने जाते हैं।
इन्हीं दक्ष प्रजापति से प्रजापति (कुम्हार) समाज की उत्पत्ति मानी जाती है।
दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ, जिससे यह समाज शिव-शक्ति परंपरा से भी जुड़ता है।
👉 इसीलिए प्रजापति समाज को सृष्टि का सहयोगी और धरती माता का पुत्र माना गया है।
कुम्हार समाज की कुलदेवी
प्रजापति समाज की मुख्य कुलदेवी – श्री श्रीयादे माता हैं।
इन्हें भक्त शिरोमणि के नाम से भी जाना जाता है।
कई राज्यों में समाज शीतला माता की भी विशेष पूजा करता है।
कुलदेवी की आराधना से समाज में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।
कुम्हार समाज का प्राचीन इतिहास
सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) से प्राप्त मिट्टी के बर्तन, खिलौने और मूर्तियाँ कुम्हार समाज की 5000 साल पुरानी कला का प्रमाण हैं।
रामायण और महाभारत काल में यज्ञ, पूजा और गृहस्थ जीवन में मिट्टी के पात्रों का उल्लेख मिलता है।
दीपक, कलश, मूर्तियाँ और यज्ञोपयोगी सामग्री कुम्हार समाज का ही योगदान था।
प्रजापति समाज का योगदान
- धार्मिक कार्यों में – मंदिरों की मूर्तियाँ, यज्ञोपयोगी पात्र और दीपक बनाना।
- सांस्कृतिक धरोहर में – दीपावली के दीये, होली के कुल्हड़, विवाह में कलश और मूर्तियाँ।
- कला और शिल्पकला में – हस्तशिल्प, बर्तन, खिलौने और कलात्मक मिट्टी के सामान।
वर्तमान समय में कुम्हार समाज
आज कुम्हार समाज केवल मिट्टी के बर्तनों तक सीमित नहीं है।
यह समाज शिक्षा, उद्योग, राजनीति, प्रशासन और आईटी क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है।
फिर भी, पारंपरिक कला जैसे दीपावली के दीये, शादी-ब्याह का कलश और धार्मिक मूर्तियाँ समाज की पहचान बनी हुई हैं।
निष्कर्ष
कुम्हार (प्रजापति) समाज का इतिहास हजारों वर्षों पुराना और गौरवशाली है।
उत्पत्ति दक्ष प्रजापति से मानी जाती है। कुलदेवी श्रीयादे माता हैं।
सिंधु घाटी से लेकर आज तक समाज ने भारतीय संस्कृति, धर्म और कला में अमूल्य योगदान दिया है।