मिट्टी कला की सांस्कृतिक और धार्मिक भूमिका
🪔 मिट्टी कला की सांस्कृतिक और धार्मिक भूमिका
1. सांस्कृतिक भूमिका
- सभ्यता की पहचान – सिंधु घाटी सभ्यता से ही मिट्टी के बर्तन, खिलौने और मूर्तियाँ मानव जीवन का हिस्सा रहे हैं।
- लोककला का प्रतीक – हर क्षेत्र में मिट्टी कला की अपनी शैली है, जैसे राजस्थान की माटी कला, गुजरात की टेराकोटा कला, बंगाल की मृत्तिका मूर्तियाँ।
- त्यौहार और परंपराएँ – दीपावली पर दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियाँ, होली में मिट्टी के बर्तन, शादी-ब्याह में मटकी सजाने की परंपरा आज भी जीवित है।
- लोक जीवन से जुड़ाव – गाँवों में मटके, सुराही, कुल्हड़ आज भी शुद्धता और परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं।
2. धार्मिक भूमिका
- पूजा-पाठ में उपयोग – मंदिरों में दीये, कलश, शंखनुमा बर्तन और मूर्तियाँ मिट्टी से ही बनाई जाती हैं।
- मूर्ति निर्माण – गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, नवदुर्गा आदि पर्वों पर देवी-देवताओं की मिट्टी की प्रतिमाएँ बनाना धार्मिक कर्तव्य माना जाता है।
- पवित्रता का प्रतीक – मिट्टी को पंचतत्वों में से एक माना गया है। माटी से बने पात्र पवित्रता और सादगी के प्रतीक हैं।
- संस्कारों में प्रयोग – विवाह, जन्म, नामकरण, श्राद्ध आदि संस्कारों में मिट्टी के बर्तन अनिवार्य रूप से उपयोग किए जाते हैं।
- गंगा मिट्टी परंपरा – गंगा तट की मिट्टी को पवित्र माना जाता है, और उससे बने दीये व मूर्तियाँ विशेष धार्मिक महत्व रखती हैं।
3. आध्यात्मिक संदेश
- मिट्टी की कला मनुष्य को यह सिखाती है कि “जैसे कुम्हार माटी को आकार देता है, वैसे ही ईश्वर हमें गढ़ता है।”
- यह कला नम्रता, सादगी और धरती से जुड़ाव का प्रतीक है।
- धार्मिक मान्यता है कि मिट्टी से बना पात्र क्षणभंगुरता और जीवन-मरण के चक्र की याद दिलाता है।
4. आधुनिक महत्व
- आज भी कुल्हड़ चाय, मिट्टी के दीये और टेराकोटा डेकोरेशन भारतीय संस्कृति को जीवित रखते हैं।
- मिट्टी कला न केवल आर्थिक आजीविका देती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर को भी आगे बढ़ाती है।