कुम्हार (प्रजापति) समाज का इतिहास और उत्पत्ति
✨ कुम्हार समाज का परिचय
कुम्हार समाज, जिसे प्रजापति समाज भी कहा जाता है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। "कुम्हार" शब्द "कुंभ" (घड़ा) से बना है, अर्थात् कुंभ बनाने वाला।
धरती और मिट्टी से जुड़ा यह समाज न केवल घड़े और बर्तन बनाता रहा है, बल्कि भारतीय परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों का आधार भी रहा है।
🕉️ प्रजापति समाज की उत्पत्ति
- पुराणों के अनुसार, दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और प्रजापतियों में प्रमुख माने जाते हैं।
- इन्हीं दक्ष प्रजापति से प्रजापति (कुम्हार) समाज की उत्पत्ति मानी जाती है।
- दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ, जिससे यह समाज शिव-शक्ति परंपरा से भी जुड़ता है।
👉 इसीलिए प्रजापति समाज को सृष्टि का सहयोगी और धरती माता का पुत्र माना गया है।
🙏 कुम्हार समाज की कुलदेवी
- प्रजापति समाज की मुख्य कुलदेवी – श्री श्रीयादे माता हैं।
- इन्हें भक्त शिरोमणि के नाम से भी जाना जाता है।
- कई राज्यों में समाज शीतला माता की भी विशेष पूजा करता है।
- कुलदेवी की आराधना से समाज में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।
📜 कुम्हार समाज का प्राचीन इतिहास
- सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) से प्राप्त मिट्टी के बर्तन, खिलौने और मूर्तियाँ कुम्हार समाज की 5000 साल पुरानी कला का प्रमाण हैं।
- रामायण और महाभारत काल में यज्ञ, पूजा और गृहस्थ जीवन में मिट्टी के पात्रों का उल्लेख मिलता है।
- दीपक, कलश, मूर्तियाँ और यज्ञोपयोगी सामग्री कुम्हार समाज का ही योगदान था।
🎨 प्रजापति समाज का योगदान
- धार्मिक कार्यों में – मंदिरों की मूर्तियाँ, यज्ञोपयोगी पात्र और दीपक बनाना।
- सांस्कृतिक धरोहर में – दीपावली के दीये, होली के कुल्हड़, विवाह में कलश और मूर्तियाँ।
- कला और शिल्पकला में – हस्तशिल्प, बर्तन, खिलौने और कलात्मक मिट्टी के सामान।
🌍 वर्तमान समय में कुम्हार समाज
- आज कुम्हार समाज केवल मिट्टी के बर्तनों तक सीमित नहीं है।
- यह समाज शिक्षा, उद्योग, राजनीति, प्रशासन और आईटी क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है।
- फिर भी, पारंपरिक कला जैसे दीपावली के दीये, शादी-ब्याह का कलश और धार्मिक मूर्तियाँ समाज की पहचान बनी हुई हैं।