दीपावली का पर्व रोशनी और खुशियों का प्रतीक है और इस त्योहार की सबसे खास पहचान हैं – मिट्टी के दीये। कुम्हार समाज द्वारा बनाए गए दीयों की मांग देशभर में हर साल तेजी से बढ़ती है। इस वर्ष भी राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार के कारीगरों ने लाखों की संख्या में मिट्टी के दीये और मूर्तियाँ तैयार कीं।
समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि दीयों का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। जब दीये जलते हैं, तो वे अंधकार को दूर कर प्रकाश और सकारात्मकता का संदेश देते हैं। यही कारण है कि मशीन से बने दीयों की तुलना में हाथ से बने मिट्टी के दीयों को लोग अधिक पसंद करते हैं।
आजकल कई कलाकार दीयों पर आकर्षक डिज़ाइन और रंगों का प्रयोग कर उन्हें और भी सुंदर बनाते हैं। दीपावली से पहले मेलों और बाजारों में कुम्हार समाज की चहल-पहल देखने लायक होती है। वहीं, कई कलाकार अब ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर भी अपने उत्पाद बेच रहे हैं, जिससे उनकी कला को देश-विदेश तक पहचान मिल रही है।
यह मांग न केवल समाज को आर्थिक रूप से सशक्त कर रही है, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति को भी जीवित रख रही है।
एक सुनियोजित प्रक्रिया से समाज में सुधार लाने की दिशा में दक्ष निरंतर प्रयासरत हैं।
समाज की जरूरतों को समझना और सही समाधान की दिशा तय करना।
सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग से सेवाओं की व्यवस्था करना।
फीडबैक और मूल्यांकन के आधार पर सेवाओं में बदलाव लाना।