भारत के त्यौहार बिना मिट्टी के दीयों, मूर्तियों और बर्तनों के अधूरे हैं। दीपावली, गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा जैसे पर्वों में कुम्हार समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है। उनके द्वारा बनाए गए दीये और मूर्तियाँ इन पर्वों की शोभा बढ़ाते हैं। यह परंपरा समाज को सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
कुम्हार समाज समय-समय पर अपनी एकता और संगठन का परिचय देता आया है। समाज के लोग सामूहिक रूप से मेलों, सभाओं और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। संगठन की मजबूती से समाज के हितों की रक्षा होती है और युवाओं को मार्गदर्शन मिलता है।
कुम्हार समाज की आर्थिक स्थिति पहले कृषि और बर्तन बनाने पर आधारित थी। आज के समय में समाज के लोग व्यवसाय, नौकरी और उद्यमिता में आगे बढ़ रहे हैं। सरकार की योजनाओं और आत्मनिर्भर भारत के अभियान से इस समाज के लोगों को अपने कौशल को नए अवसरों में बदलने का मौका मिल रहा है।
पहले कुम्हार समाज मुख्य रूप से अपने पारंपरिक काम पर निर्भर रहता था, लेकिन अब समाज के लोग शिक्षा की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। युवा वर्ग स्कूलों, कॉलेजों और प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी मेहनत से सफलता प्राप्त कर रहा है। शिक्षा ने समाज को नई पहचान और सम्मान दिलाने का कार्य किया है।
एक सुनियोजित प्रक्रिया से समाज में सुधार लाने की दिशा में दक्ष निरंतर प्रयासरत हैं।
समाज की जरूरतों को समझना और सही समाधान की दिशा तय करना।
सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग से सेवाओं की व्यवस्था करना।
फीडबैक और मूल्यांकन के आधार पर सेवाओं में बदलाव लाना।